सती प्रथा
भारत में प्राचीन हिन्दू समाज की एक घिनौनी एवं ग़लत प्रथा है। इस प्रथा में जीवित विधवा पत्नी को मृत पति की चिता पर ज़िंदा ही जला दिया जाता था। 'सती' हिंदुओं के कुछ समुदायों की एक प्रथा थी, जिसमें हाल में ही विधवा हुई महिला अपने पति के अंतिम संस्कार के समय स्वंय भी उसकी जलती चिता में कूदकर आत्मदाह कर लेती थी।
भारतीय (मुख्यतः हिन्दू) समाज में सती प्रथा का उद्भव यद्यपि प्राचीन काल से माना जाता है, परन्तु इसका भीषण रूप आधुनिक काल में भी देखने को मिलता है। सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य 510 ई. एरण अभिलेख में मिलता
सती प्रथा के कारण
प्राचीन काल में सती प्रथा का एक यह भी कारण रहा था।
आक्रमणकारियों द्वारा जब पुरुषों की हत्या कर दी जाती थी, उसके बाद उनकी पत्नियॉं अपनी अस्मिता व आत्मसम्मान को महत्वपूर्ण समझकर स्वयमेव अपने पति की चिता के साथ आत्मत्याग करने पर विवश हो जाती थी।
कालांतर में महिलाओं की इस स्वैच्छिक विवशता का अपभ्रंश होते-होते एक सामाजिक रीति जैसी बन गयी, जिसे सती प्रथा के नाम से जाना जाता है
सती प्रथा का अंत
ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया। जिसके फलस्वरूप इस आन्दोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को सती प्रथा को रोकने के लिये कानून बनाने पर विवश होना पड़ा था। अन्तत: उन्होंने सन् 1829 में सती प्रथा रोकने का कानून पारित किया। इस प्रकार भारत से सती प्रथा का अन्त हो गया।
वर्तमान
आज भी वर्तमान में ऐसी घटना घटती रहती हैं जिसके कारण आज भी महिलाएँ असुरक्षित महसूस कर रहीं हैं जैसे- गैंग रेप, बाल विवाह,दहेज प्रथा,जातिवाद, भेदभाव,आदि ऐसे आज भी समाज में बहुत सारी घटनाएं हो रही है इन सभी कारणों से महिलाओ को काफी हद तक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है जिससे समाज में दुष्कर्म बढ़ता ही जा रहा है
विवाह-दहेज प्रथा
आज दहेज प्रथा मृत्यु भोज आदि के विरोध में संत रामपाल जी महाराज और उनके समर्थक लगातार प्रयासरत है हमारे समाज के लोग उन्हें इन प्रयासों के कारण समाज से बाहर और उन्हें दंडित किया जा रहा है
हम केवल एक मुख दर्शक बनकर उन्हें देख रहे हैं यही सबसे बड़ी हमारी भूल है अगर हमें अपने समाज से दहेज प्रथा मृत्यु भोज बाल विवाह और सबसे बड़ा हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वास को अगर मिटाना है तो हमें संत रामपाल जी महाराज और उनके समर्थकों का साथ देना होगा ताकि समाज से बुराईयां मिटा सके।
संत रामपाल जी महाराज के द्वारा बनाई गई पुस्तक "ज्ञान गंगा" और "जीने की राह "इन पुस्तकों में वास्तविक ज्ञान के बारे में बताया गया है हमें अपने जीवन को बदलने के लिए यह दोनों पुस्तकें पढ़ना अनिवार्य है
इन दोनों पुस्तकों की प्राप्ति के लिए आप कमेंट में अपना नाम पता और मोबाइल नंबर लिख सकते हैं या आप हमारी वेबसाइट भी विजिट कर सकते हैं साथ ही साथ आप हमें फेसबुक टि्वटर युटुब आदि पर देख सकते है
Web. Www. Jagatgururampalji.org

भारत में प्राचीन हिन्दू समाज की एक घिनौनी एवं ग़लत प्रथा है। इस प्रथा में जीवित विधवा पत्नी को मृत पति की चिता पर ज़िंदा ही जला दिया जाता था। 'सती' हिंदुओं के कुछ समुदायों की एक प्रथा थी, जिसमें हाल में ही विधवा हुई महिला अपने पति के अंतिम संस्कार के समय स्वंय भी उसकी जलती चिता में कूदकर आत्मदाह कर लेती थी।
भारतीय (मुख्यतः हिन्दू) समाज में सती प्रथा का उद्भव यद्यपि प्राचीन काल से माना जाता है, परन्तु इसका भीषण रूप आधुनिक काल में भी देखने को मिलता है। सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य 510 ई. एरण अभिलेख में मिलता
सती प्रथा के कारण
प्राचीन काल में सती प्रथा का एक यह भी कारण रहा था।
आक्रमणकारियों द्वारा जब पुरुषों की हत्या कर दी जाती थी, उसके बाद उनकी पत्नियॉं अपनी अस्मिता व आत्मसम्मान को महत्वपूर्ण समझकर स्वयमेव अपने पति की चिता के साथ आत्मत्याग करने पर विवश हो जाती थी।
कालांतर में महिलाओं की इस स्वैच्छिक विवशता का अपभ्रंश होते-होते एक सामाजिक रीति जैसी बन गयी, जिसे सती प्रथा के नाम से जाना जाता है
सती प्रथा का अंत
ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया। जिसके फलस्वरूप इस आन्दोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को सती प्रथा को रोकने के लिये कानून बनाने पर विवश होना पड़ा था। अन्तत: उन्होंने सन् 1829 में सती प्रथा रोकने का कानून पारित किया। इस प्रकार भारत से सती प्रथा का अन्त हो गया।
वर्तमान
आज भी वर्तमान में ऐसी घटना घटती रहती हैं जिसके कारण आज भी महिलाएँ असुरक्षित महसूस कर रहीं हैं जैसे- गैंग रेप, बाल विवाह,दहेज प्रथा,जातिवाद, भेदभाव,आदि ऐसे आज भी समाज में बहुत सारी घटनाएं हो रही है इन सभी कारणों से महिलाओ को काफी हद तक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है जिससे समाज में दुष्कर्म बढ़ता ही जा रहा है
विवाह-दहेज प्रथा
दहेज प्रथा से अभिप्राय उस धन सामग्री और संपत्ति आदि से होता है जो कि विवाह में कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को दी जाती है। इसके अतिरिक्त यह धनराशि विवाह से पूर्व भी तय करके कन्या पक्ष वाले वर पक्ष वालों को दे दिया करते हैं। प्राचीन काल में तो इस दहेज प्रथा का प्रचलन केवल ऊंचे कुलों में ही होता था परंतु वर्तमान युग में तो यह प्रायः प्रत्येक परिवार में ही प्रारंभ हो गई है।
इस दहेज प्रथा के कारण विवाह एक व्यापार प्रणाली बन गया है। यह हिंदू समाज का शत्रु तथा उस पर एक कलंक के समान है। इसमें ना जाने कितने घर बर्बाद कर दिए हैं। कितनों को भुखमरी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है तथा कितनी ही कुमारियों को अल्प आयु में ही घुट-घुट कर मरने को विवश कर दिया है। इस प्रथा के कारण समाज में बाल विवाह, अनमेल विवाह तथा विवाह-विच्छेद जैसी अनेक कुरीतियों ने जन्म ले लिया है। इससे समाज की प्रगति रुक गई है। इसी दहेज प्रथा के कारण कितनी ही नारियां विवाह के उपरांत जलाकर मार दी जाती हैं। इसके कारण बहुत से परिवार तो लड़की के जन्म लेते ही दुखी हो जाते हैं।
यह हमारे समाज के लिए एक अभिशाप सा है। इससे छुटकारा पाने के लिए हमें भरसक प्रयत्न करने चाहिए। इसके लिए हम नवयुवकों को अंतर्जातीय विवाह के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं क्योंकि इससे वर ढूंढने का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। इसके अतिरिक्त सरकार को समाज सुधारको, कवियों, उपन्यासकारों, पत्रकारों तथा चलचित्र निर्माताओं आदि की सहायता से समाज में दहेज के विरुद्ध प्रचार करना चाहिए। स्त्री शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि वे इस प्रथा का डटकर सामना कर सकें। यह दहेज प्रथा हमारे समाज में अनेकों अबलाओं को नित्यप्रति काल के ग्रास में पहुंचा रही है। यह प्रथा दिन प्रतिदिन विकराल रूप धारण कर रही है। धीरे-धीरे सारा समाज इसकी चपेट में आता जा रहा है। अतः हम सब को मिलकर इस प्रथा की जड़ को ही समाप्त कर देना चाहिए तभी हमारा समाज प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता है।
इतने महापुरुषों के संघर्षों के बाद भी आज समाज में इतनी बुराई जाते हैं जिससे हमारा समाज हमारा देश आगे बढ़ने की वजह पीछे धकेला जा रहा है और आज भी हम महापुरुषों के साथ वैसा ही बर्ताव कर रहे है जैसे हमने पूर्व के महापुरुषों के साथ किया था
हम केवल एक मुख दर्शक बनकर उन्हें देख रहे हैं यही सबसे बड़ी हमारी भूल है अगर हमें अपने समाज से दहेज प्रथा मृत्यु भोज बाल विवाह और सबसे बड़ा हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वास को अगर मिटाना है तो हमें संत रामपाल जी महाराज और उनके समर्थकों का साथ देना होगा ताकि समाज से बुराईयां मिटा सके।
संत रामपाल जी महाराज के द्वारा बनाई गई पुस्तक "ज्ञान गंगा" और "जीने की राह "इन पुस्तकों में वास्तविक ज्ञान के बारे में बताया गया है हमें अपने जीवन को बदलने के लिए यह दोनों पुस्तकें पढ़ना अनिवार्य है
इन दोनों पुस्तकों की प्राप्ति के लिए आप कमेंट में अपना नाम पता और मोबाइल नंबर लिख सकते हैं या आप हमारी वेबसाइट भी विजिट कर सकते हैं साथ ही साथ आप हमें फेसबुक टि्वटर युटुब आदि पर देख सकते है
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